बुधवार, 3 नवंबर 2010

तेरी हंसी की खिलखिलाहट
गूँज उठी सरे वितान में
यूँ लगा जैसे
मंदिर कि घंटियों को
हिला दिया हो किसी बच्चे ने
अपनी नन्ही हथेलियों से ।
एक सरगम सी छा रही
इस अलसाई अमराई में
लगता है जैसे
तुम गुनगुना उठी हो
कोई गीत
भूला बिसरा अपने बचपन का ।
तुम होती हो
जब यूँ ही
कहीं आस पास
जग सारा कितना सिमटा सिमटा
सा लगता है
सोचता हू अक्सर
तुम हो तो ये दुनिया है
या मेरी दुनिया ही तुम हो ।
अब जो भी हो बस तुम हो
मुझे कुछ नहीं कहना । । । ।